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Saturday, 24 September 2022

ऋतु खंडूड़ी ने उठाई राजस्व पुलिस व्यवस्था खत्म करने की मांग,मुख्यमंत्री को लिखा पत्र

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उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता हत्याकांड के बाद स्पीकर ऋतु खंडूरी ने लिखा मुख्यमंत्री धामी को पत्र, राजस्व पुलिस व्यवस्था समाप्त करने की उठाई मांग।
उन्होंने मांग की है कि प्रदेश में जहाँ-कहीं भी राजस्व पुलिस की व्यवस्था चली आ रही है, उन्हें तत्काल समाप्त कर सामान्य पुलिस बल के थाने / चौकी स्थापित करने की मांग की, इस विषय पर उन्होंने मुख्यमंत्री धामी  को पत्र लिखा है।
उत्तराखंड में कुल नौ पर्वतीय व चार मैदानी ज़िले हैं. ब्रिटिश राज में यहां पटवारी पुलिस यानी राजस्व पुलिस की व्यवस्था शुरू हुई थी, जिसके मुताबिक राजस्व क्षेत्रों में होने वाले हर किस्म के अपराध की जांच राजस्व पुलिस ही करती है. उत्तराखंड के सिर्फ 40 प्रतिशत हिस्से में सिविल पुलिस है और राजस्व पुलिस के क्षेत्र में बीते कुछ सालों में अपराध का ग्राफ बढ़ता रहा है. चूंकि ब्रिटिश राज में यहां अपराध बहुत कम थे इसलिए रेवेन्यू पुलिस सिस्टम बनाया गया था, जो अब प्रासंगिक नहीं रहा.

2018 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने इस व्यवस्था को समाप्त करने के आदेश दिए थे, लेकिन कई साल बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है. 2013 में केदारनाथ में आपदा के समय तत्कालीन सीए विजय बहुगुणा ने कहा था कि यदि पहाड़ी इलाकों में रेगुलर पुलिस की व्यवस्था होती तो आपदा से होने वाला नुकसान कम होता. ज़रूरत तो कई बार महसूस की जा चुकी है कि रेवेन्यू पुलिस सिस्टम को खत्म किया जाए, लेकिन फिलहाल यह जस की तस बनी हुई है.

उत्तराखंड राज्य का 61 प्रतिशत हिस्सा आज भी ऐसा है, जहां न तो कोई पुलिस थाना है, न कोई पुलिस चौकी और न ही यह इलाका उत्तराखंड पुलिस के क्षेत्राधिकार में आता है। यहां आज भी अंग्रेजों की बनाई वह व्यवस्था जारी है, जहां पुलिस का काम रेवेन्यू डिपार्टमेंट के कर्मचारी और अधिकारी ही करते हैं। इस व्यवस्था को ‘राजस्व पुलिस’ कहा जाता है। उत्तराखंड के 12 हजार से अधिक गांव राजस्व पुलिस के क्षेत्र में आते हैं।
शुरूआत में गढ़वाल में 86 और कुमाऊं में 125 पटवारी क्षेत्रों में राजस्व पुलिस चौकियां थीं।

 पटवारी, लेखपाल, कानूनगो और नायब तहसीलदार जैसे कर्मचारी और अधिकारी ही यहां रेवेन्यू वसूली के साथ-साथ पुलिस का काम भी करते हैं। कोई अपराध होने पर इन्हीं लोगों को एफआईआर भी लिखनी होती है, मामले की जांच-पड़ताल भी करनी होती है और अपराधियों की गिरफ्तारी भी इन्हीं के जिम्मे है। जबकि इनमें से किसी भी काम को करने के लिए इनके पास न तो कोई संसाधन होते हैं और न ही इन्हें इसकी ट्रेनिंग मिलती है।
1861 में ब्रिटिश राज के दौरान यहां पहाड़ी ज़िलों में रेवेन्यू पुलिस सिस्टम शुरू हुआ था, जिसके तहत राजस्व अधिकारियों को पुलिस के बराबर अधिका​र ​हासिल थे और वो किसी भी केस की जांच कर सकते थे. करीब 160 साल और ब्रिटिशों से देश को आज़ादी मिलने के 73 साल बाद भी उत्तराखंड में यह व्यवस्था बनी हुई है? 

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