देवभूमि का मर्म

"खटीमा (उत्तराखंड) से प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र"

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Monday, 31 August 2020

कितने गहरे पानी में है उत्तराखंड में आम आदमी पार्टी ?

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 आप की संभावनाएं और चुनौतियाँ------------------------- दिनेश तिवारी (संपादक )



     यूँ तो उत्तराखंड  में आम आदमी पार्टी की सक्रियता बीते चार माह से ही बढ़ चुकी थी लेकिन पार्टी के 2022 में सभी70 सीटों पर चुनाव लड़ने के आधिकारिक ऐलान के बाद प्रदेश में राजनैतिक हलचल तेज हो गई है।प्रदेश की परिस्थितियों की बात करें तो राज्य गठन के 20 वर्षों में बारी बारी से भाजपा और कांग्रेस द्वारा शासन किये जाने के बावजूद प्रदेश की दशा व दिशा जस की तस है यहां तक कि कई मामलों में स्थिति संयुक्त उत्तर प्रदेश के समय से भी बदतर ही हुई हैं ऐसे में प्रदेश की जनता तीसरे विकल्प की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रही है ,और दिल्ली में आम आदमी पार्टी द्वारा केंद्र से अपेक्षित सहयोग न मिलने के बावजूद बिजली पानी व परिवहन के साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर जो उल्लेखनीय कार्य किया है तथा विभिन्न सरकारी सेवाओं को बिना दफ्तरों के धक्के खाये घर घर तक पहुंचाने का कार्य किया है उससे ये पार्टी काफी संभावनाएं जगाती है,ये देश की इकलौती  ऐसी पार्टी है जो 5 साल शासन करने के बाद जनता से खुलकर कहती है कि यदि हमने काम नहीं किया है तो आप हमे वोट मत देना और इसके बावजूद प्रचंड बहुमत से फिर जीतकर आती है। ऐसे में समस्याओं से जूझते इस पहाड़ी प्रदेश की जनता पार्टी को दिल्ली की भांति यहाँ भी जनादेश दे दे तो आश्चर्य नही होना चाहिए।लेकिन इसके लिये यहाँ पार्टी के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं अपेक्षाकृत नई पार्टी के सामने भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों  के जैसा विशाल संगठन करना सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि पार्टी  बेमन से ही सही लेकिन अपनी स्थापना वर्ष 2013 से ही प्रदेश में  पैर पसारने की कोशिशों के बावजूद पार्टी को इसमें अपेक्षित सफलता नही मिल सकी है।वहीं पार्टी का वन मैन आर्मी होना भी चिंताजनक है क्योंकि पार्टी की सारी राजनीति अरविंद केजरीवाल के इर्द गिर्द सिमटी है और उनके दिल्ली छोड़ने की दूर दूर तक कोई संभावना नही है ऐसे में प्रदेश का नेतृत्वकर्ता कौन सा चेहरा होगा तथा उसमे केजरीवाल जैसी चमत्कारिक क्षमता होगी ये कहना बहुत मुश्किल है।पार्टी का दिल्ली के बाहर का कमजोर प्रदर्शन भी इस बात की तस्दीक करता है क्योंकि पार्टी ने पंजाब,गोवा और हरियाणा में भी बहुत कोशिश की थी लेकिन कामयाबी नही हासिल कर सकी।ऐसे में उत्तराखंड के लिए पार्टी कौन सी अनोखी रणनीति अपनायेगी इस पर भी सवाल हैं।पार्टी के तीसरे विकल्प बनने की संभावना के चलते इस समय इससे जुड़ने वालों की होड़ तो लगी है लेकिन इनमें से अधिकांश वही हैं जो भाजपा और कांग्रेस की गोद में खेलकर ही यहाँ पहुंचे हैं ऐसे में इस पार्टी से जुड़कर उनकी मानसिकता और तौर तरीके बदल जायेंगे ये बात लोगों को समझाना भी पार्टी के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा।प्रतिद्वंदियों की बात करें तो भाजपा की इस समय तूती बोल रही है ,प्रदेश सरकार के लचर कामकाज के चलते सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी अवश्यम्भावी रुझानों के बावजूद पार्टी को कमतर नहीं आंका जा सकता,फिर ये नही भूलना चाहिए कि इस पार्टी के पास इस समय अपार संसाधनों के साथ ही  नरेंद्र मोदी के रूप में ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो खाली नही जाता, ये और बात है कि दिल्ली चुनाव में इसी ब्रह्मास्त्र सहित सारे दांव पेंच अपनाने और पूरी ताकत झोंकने के बावजूद पार्टी आम आदमी पार्टी से बुरी तरह परास्त हुई है,और यही बात आप के आत्मविश्वास को भाजपा के सामने कई गुना बढ़ा देती है।कांग्रेस की बात करें तो दो बार सरकार बना चुकी यह पार्टी वर्तमान सरकार की नाकामियों के चलते राज्य की परंपरा अनुसार स्वाभाविक दावेदार तो है परंतु यह अपने ही अंतर्विरोधों से घिरी नजर आती है,पार्टी के पास सशक्त चेहरे के रूप में प्रदेश के सबसे बड़े जमीनी नेता पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत होने के बावजूद अंतर्कलह के कारण वे अभिमन्यु सरीखे ही नजर आते हैं ।इसके अतिरिक्त मध्यप्रदेश ,गोवा  ,कुछ हद तक राजस्थान और स्वयं उत्तराखंड में एक दर्जन मंत्री विधायक जिस तरह से पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं उससे लोगों में ये विश्वास हो पाना मुश्किल है कि जिसे वे कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में जिताएंगे वह कल को भाजपा में शामिल नहीं होगा।यूकेडी तथा सपा व बसपा की बात करें तो ये पार्टियां प्रदेश में केवल उपस्थिति दर्ज करवाने तक सीमित हैं।इन तमाम परिस्थितियों के मद्देनजर आम आदमी पार्टी कौन सी रणनीति अख्तियार करती है और प्रदेश की राजनीति का ऊँट किस करवट बैठता है यह देखना दिलचस्प होगा,फिलहाल तीसरे विकल्प की तलाश में बैठे प्रदेशवासियों के लिए पार्टी ने उम्मीद तो जगा ही दी है।

Sunday, 30 August 2020

भाजपा के लिए बड़ी मुसीबत बनेगा खटीमा का तलवारबाजी प्रकरण !

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 शनिवार को एक कार्यक्रम में हुए विवाद के बाद भाजपा झनकट मंडल के पूर्व अध्यक्ष पर वर्तमान मंडल महामंत्री द्वारा जिस तरह से तलवार का हमला किया गया और पूर्व अध्यक्ष इसमे बाल बाल बचे,शुरू में इसे कार्यकर्ताओ का आपसी विवाद और क्षणिक आवेश का नतीजा माना जा रहा था।लेकिन रविवार को पूर्व मंडल अध्यक्ष द्वारा जिस तरह से बयान जारी करके नानकमत्ता विधायक पर इस मामले को लेकर आरोप लगाए गए और शाम को मामले के आरोपी मंडल महामंत्री की क्षेत्र पंचायत सदस्य पत्नी द्वारा वीडियो जारी कर खटीमा विधायक समेत कुछ भाजपा पदाधिकारियो पर आरोप लगाये गए इससे मामला गंभीर रूप लेता जा रहा है,जो कहीं न कहीं भाजपा की अंतर्कलह को भी उजागर करता है।ऐसे समय मे जब 2022 का विधानसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं है और सभी पार्टियां खुद की कमजोरियों को दूर करने की जद्दोजहद में जुट गई हैं भाजपा के लिए यह प्रकरण बड़ी परेशानी का कारण बन सकता है,विशेषकर पर्दे के पीछे से जिस तरह से कतिपय लोगों द्वारा मामले को लेकर दो समुदायों के बीच बैमन्यस्ता पैदा करने की कोशिश की जा रही है वह पार्टी के साथ ही समाज के लिए भी घातक हो सकता है।और यदि भाजपा नेतृत्व द्वारा मामले में त्वरित हस्तक्षेप नहीं किया गया तो यह प्रकरण आगामी चुनाव में पार्टी के लिए बड़े नुकसान का सबब भी बन सकता है।



Sunday, 23 August 2020

खटीमा बाज़ार में ऐसा क्या हुआ कि अफरातफरी के बीच धडाधड गिरने लगे दुकानों के शटर

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 रविवार दोपहर खटीमा बाजार में अचानक मची अफरातफरी के बाद धड़ाधड़ दुकानों के शटर बंद होने लगे और कुछ देर बाद लगभग पूरा बाजार बंद हो गया।हुआ यूँ कि रविवार सुबह एस डी एम और तहसीलदार की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आने के बाद दोनों अधिकारियो ने स्वयं को होम आइसोलेट करने के साथ ही अपील भी की थी कि हाल ही में जो लोग उनके संपर्क में आये थे वे अपनी जाँच करा लें।वहीं स्वास्थ विभाग की टीम पुलिस को साथ लेकर दोपहर को बाजार पहुंची तथा दुकानदारों व उनके स्टाफ का रैपिड एंटीजेन टेस्ट कराने को कहने लगी इस पर व्यापारी भड़क गए उनका कहना था कि उन्हें खुद के स्वास्थ की चिंता है और यदि उन्हें कोई परेशानी महसूस हो रही होगी तो वे स्वयं अपना टेस्ट करवाने अस्पताल पहुंचेंगे लेकिन जबरन टेस्ट नही कराने देंगे उनका ये भी कहना था कि पहले तो रैपिड टेस्ट की जाँच प्रमाणिक नही है जिसका उदाहरण राजीव नगर निवासी स्व पी के चौधरी हैं जिनकी रैपिड जाँच कोरोना पॉजिटिव आई थी जबकि मौत के बाद पहुंची आर टी पी सी आर रिपोर्ट नेगेटिव थी,व्यपारियो का यह भी कहना था कि जाँच रिपोर्ट पॉजिटिव आने पर उनके प्रतिष्ठान और आवास को सील करने के साथ ही उनके पूरे मोहल्ले को कंटेन्मेंट जोन बना दिया जायेगा,और 5 माह से लगातार परेशानी झेलते हुए उन लोगों के लिए ये दोहरा आघात होगा जिसे वे बर्दास्त नही करेंगे।हालाँकि विरोध को देखते हुए टीम द्वारा उन्हें आश्वस्त किया गया कि टैस्ट स्वेच्छिक होंगे और किसी का जबरन टेस्ट नही किया जायेगा लेकिन व्यापारियो ने उन पर मनमानी का आरोप लगाते हुए दुकाने बंद करनी शुरू कर दी और देखते देखते लगभग पूरा बाजार बंद हो गया।विरोध करने वाले व्यवसाइयों में व्यापार मंडल महामंत्री अमन अरोड़ा,कोषाध्यक्ष हिमांशु अग्रवाल ,पूर्व महामंत्री तरुण ठाकुर,जानकी ओली,सुखदेव सिंह,विक्की गुलाटी,ऐन बी तिवारी महेश जोशी,नरेश गुप्ता,रवि अग्रवाल आदि शामिल थे।

Saturday, 15 August 2020

कोरोना नहीं लापरवाही से मरे थे चौधरी!

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कोरोना के कारण खटीमा में हुई पहली मौत के रूप मे प्रचारित किये गए 56 वर्षीय पी के चौधरी के मामले में एक चौकाने वाला खुलासा हुआ है 10 अगस्त की जारी उनकी कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव है। इस रिपोर्ट आने के बाद जहाँ प्रशासन की कर्यप्रणाली की पोल खुल गई है वहीं चौधरी की पुत्री पिया चौधरी के इन आरोपों को भी बल मिला है कि उसके पिता की मौत स्वास्थ विभाग की लापरवाही से हुई है जिसे कोरोना बताया जा रहा है।पिया के प्रार्थना पत्र पर जिलाधिकारी द्वारा इस मामले की जाँच के आदेश पहले ही दिए जा चुके हैं, अब इस रिपोर्ट के बाद जब लापरवाही पुष्ट होती नजर आ रही है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि जाँच के बाद दोषियों को सजा अवश्य मिलेगी।

  वहीं पी के चौधरी की कोरोना रिपोर्ट मामले में नया खुलासा करते हुए खटीमा नागरिक चिकित्सालय के कोविड प्रभारी डा.वी पी सिंह के अनुसार चौधरी की 10 अगस्त की आर टी पी सी आर जाँच की गई थी जिसकी रिपोर्ट 14 को आई है वह रिपोर्ट नेगेटिव है,लेकिन मरीज की हालत बिगड़ने के बाद  जब 11 अगस्त को उनका रैपिड एंटीजेन टैस्ट किया गया तो उसमें वे पॉजिटिव पाए गए थे और आई सी एम आर की गाइडलाइन के अनुसार यदि रैपिड एंटीजेन टैस्ट में व्यक्ति पॉजिटिव पाया जाता है तो वह पॉजिटिव ही माना जायेगा

 


Sunday, 2 August 2020

भाषाई अस्मिता के संघर्ष को फिर से धार देंगे धामी।

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फोटो-
हर स्तर पर अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म कर राष्ट्रभाषा हिंदी और मातृ भाषा लागू हो
अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के राष्ट्रीय सचिव धामी ने किया नई शिक्षा नीति का स्वागत
बोले, लाॅकडाउन के बाद इस मुद्दे को सरकार के समक्ष उठाएंगे 
खटीमा। भाषाई अस्मिता के लिए संघर्षरत अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के राष्ट्रीय सचिव रवींद्र सिंह धामी ने कहा कि हिंदी भाषा को लेकर लड़ी गई लड़ाई के फलस्वरूप आज शिक्षा नीति में बदलाव देखकर बहुत खुशी हुई है। देर से ही सही मोदी सरकार ने शिक्षा नीति को लेकर आज जो फैसला लिया है वह स्वागत योग्य है। उन्होंने यूपीएससी समेत सभी परीक्षाओं में भी अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर राष्ट्र भाषा हिंदी समेत भारतीय भाषा लागू की करने की मांग की।
नई शिक्षा नीति का स्वागत करते हुए अंग्रेजी की अनिवार्यता हर स्तर पर समाप्त कर मातृभाषा को बढ़ावा देने के लिए संघर्षरत रवींद्र सिंह धामी ने कहा कि भाषा आंदोलन में शामिल उनकी मांगों में मैकाले की शिक्षा व्यवस्था को बदलकर मातृभाषा में शिक्षा देने की मांग भी थी, जो आज मोदी सरकार ने पूरी की है। मैकाले की शिक्षा नीति को बदलने की अब तक कोई हिम्मत नहीं जुटा पाया। 
धामी ने कहा कि मैकाले की शिक्षा नीति देश से भारतीय सनातन संस्कृति को धीरे-धीरे खत्म कर रही थी, क्योंकि मैकाले ने भारत में अंग्रेजीयत की शिक्षा नीति लागू की थी। उन्होंने कहा कि बच्चों का बौद्धिक और मानसिक विकास मातृभाषा में ही बेहतर होता है। लिहाजा, मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा होने से इसके सार्थक नतीजे बहुत जल्द सामने आएंगे। साथ ही भारतीय संस्कृति की वाहक भारतीय भाषाओं को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने बताया कि गांधीजी ने भी मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा की जरूरत बताई थी।
90 के दशक में हुए भाषा आंदोलन के बाबत धामी ने कहा कि अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के बैनर तले 12 मई 1994 को अपनी मातृ भाषा के लिए दिल्ली में संघ लोक सेवा आयोग के समक्ष ऐतिहासिक धरना दिया था, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, अटल विहारी वाजयेपी, उप प्रधानमंत्री देवीलाल आदि समेत कई नेता, संपादक और साहित्यकार शामिल हुए थे। इस दौरान आंदोलनकारी कई बार गिरफ्तार हुए और तिहाड़ जेल तक गए, लेकिन कदम पीछे नहीं हटाए, नतीजतन अंग्रेजीयत बेनकाब हुई और भारतीय भाषा को बढ़ावा मिला।
उन्होंने कहा कि 90 के दशक में अंग्रेजीयत के खिलाफ ऐतिहासिक आंदोलन में शामिल रही शक्तियों के आगे आने के बाद ही मातृभाषा को लेकर ही इस पर विचार मंथन तेज हुआ। उन्होंने मांग की कि जिस तरह नई शिक्षा नीति बनाई गई है, उसी तरह यूपीएससी समेत सभी परीक्षाओं में भी हिंदी समेत भारतीय भाषाएं लागू की जाए। उन्होंने मोदी सरकार और भाषा आंदोलन के समर्थकों से आग्रह किया कि यूपीएससी समेत सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करने की पहल करें। आम आदमी की सोच की तरह अगर आम आदमी के लिए नीतियां बनेंगी तो भारत फिर विश्व गुरू बन सकता है। उन्होंने कहा कि जल्द ही यूपीएससी समेत अन्य परीक्षाओं में भी अंग्रेजीयत का वर्चस्व खत्म करने के लिए लाॅकडाउन के बाद दिल्ली में सरकार के समक्ष मामला उठाया जाएगा।