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Tuesday, 25 July 2017

अलौकिक है देवभूमि की बैसी : भुवन बिष्ट

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श्रावण मास में शिव मंदिरों में भक्तों की जहां भीड़ लगी रहती है वहीं गंगा जल लेने कावड़ियों की लंबी लंबी कतारें आस्था की झलक को दिखलाती है | देवभूमि में अटूट आस्था का सदैव ही संगम होता है | आस्था सब पर भारी पड़ती है, देवभूमि उत्तराखण्ड के गांवों में लोकदेवता के प्रति सदैव ही लोगों की गहरी आस्था रहती है और जन लोक कल्याण के लिए समय समय पर इन लोकदेवता के मंदिरों में विभिन्न भक्ति कार्यक्रमों, अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है | श्रावण मास में लोकदेवता के मंदिरों में होती है बैसी , जो एक कठिन साधना के रूप में जानी जाती है | हमारी भारत भूमि सदैव ही महान रही है और देवभूमि उत्तराखण्ड देवों की तपोभूमि रही है यह आध्यात्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण रही है यहां पावन नदियों का संगम हो या चाहे चार धाम की पावनता हो सदैव ही देवों ने उत्तराखण्ड को देवभूमि बनाया है | इसलिए देवों के प्रति यहां के लोगों में अगाध आस्था , श्रद्धा, विश्वास समाया हुवा है | जिससे की वर्ष भर इन पूजा के लिए इन मंदिरों व पावन नदियो में स्नान के लिए सदैव भक्तों की भीड़ रहती है | देवभूमि उत्तराखण्ड में लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं गुरू गोरखनाथ, हरज्यू, सैम ज्यू, न्यायी देवता गोल्ज्यू महाराज आदि अनेक देवी देवता | इन देवी देवताओं के प्रति श्रद्धालुओं की अटूट आस्था बनी है | लोकदेवताओं के पूजन की विधियां भी अलग अलग हैं | अटूट व गहरी आस्था होने के कारण श्रद्धालुओं द्वारा इन मंदिरों में समय समय भक्ति , यज्ञ पूजा पाठ आदि आयोजन किये जाते हैं इनमें प्रमुख स्थान है बैसी का | न्यायी देवता गोल्ज्यू, हरज्यू, सैम ज्यू , गुरू गोरखनाथ की धूनियां व मंदिर देवभूमि में बने हैं और इन्में अटूट आस्था भक्तों की बनी रहती है | बैसी का शाब्दिक अर्थ बनता है बाईस दिनों का भक्ति कार्यक्रम | बैसी मुख्य.रूप से श्रावण मास व पौष (पूस) के माह में आयोजित होती हैं तथा समय समय पर नवरात्रो आदि में भी इन मंदिरों में चहल पहल बनी रहती है किंतु बैसी का अपना एक.विशेष महत्व माना जाता है जिसे सुख समृद्धि , शांति, सामाजिक उन्नति, गांवों की खुशहाली के लिए लाभदायक एंव फलदायी माना जाता है | बैसी निरंतर बाईस दिनों तक चलने वाला भक्ति कार्यक्रम है श्रावण (सावन ) माह में बैसी का आयोजन किया जाता है | गहरी आस्था व श्रद्धा के कारण अनेक बार इन मंदिरों में भक्तों व डंगरियों द्वारा तिमाही(त्रैमासिक,) व छःमासी( छःमहिने का भक्ति कार्यक्रम ) भी आयोजित किये जाते हैं | बैसी को कठिन साधना के रूप में भी जाना जाता है | लोकदेवता के इन मंदिरों में भक्तों की गहरी आस्था रहती है | बैसी में बाइस दिनों तक संन्यासी रूप में रहकर सात्विक विचार धाराओं से रहना पड़ता है , बैसी भक्ति संबधित व भक्ति से संबधित धार्मिक, आध्यात्मिक आयोजन है इसमें नियमित पूजा पाठ, भगवान को लगने वाला भोग व जागर आदि कार्यक्रमों का बहुत अधिक महत्व है | प्रातःकाल जल्दी उठकर ठंडे जल से स्नान , मंदिर स्वच्छता व पूजा कार्यक्रम किये जाते हैं भोजन के पश्चात स्नान व सायंकालिन पूजा से पहले ठंडे जल से स्नान किया जाता है | संन्यासी व सात्विक विचार धारा से रहने के कारण बाईस दिनों तक पारिवारिक माया मोह का त्याग करके आराध्य लोकदेवता के मंदिर में रहा जाता है | और केवल धोती, नंगे पांव (जूते चप्पल के बिना ) ही मंदिर में सेवा की जाती है | पूस माह में अत्यधिक व कंपकपाने वाली ठंड होने के कारण इसे कठिन साधना माना जाता है , बैसी में आराध्य लोकदेवताओं को भोग लगाया जाता है वैसे गांवों में हर अच्छे कार्य , त्यौहारों व परिवारों में विवाह समारोंहों के कार्यो के सफल आयोजनों की कामना व खुशहाली सुख समृद्धि के लिए भी लोकदेवता के मंदिरों में भोग लगाया जाता है | बैसी (बाइस दिनों तक चलने वाला धार्मिक आयोजन) में लोकदेवताओं को प्रसन्न करने के लिए पूर्ण भक्ति भाव पूजा पाठ का आयोजन किया जाता है बैसी , में प्रातःकाल व सांयकाल की आरती (पू़जा) का भी विशेष महत्व होता है इसमें गांव व आसपास के बच्चे , व अन्य भक्त लोग शामिल होते हैं | इससे गांव की खुशहाली, सम्पन्नता, रोग दोष दूर करने के लिए भी लोकदेवताओं से प्रार्थना व कामना की जाती है | बैसी में लोकदेवताओं को प्रसन्न करने व आशीर्वाद लेने के लिए लोकदेवता के मंदिर में जागर का आयोजन भी किया जाता है तथा लोकदेवताओं को जागर के माध्यम से अवतरित भी किया जाता है | जागर में देव डंगरियों द्वारा जनमानस को आशीर्वाद दिया जाता है तथा गांव व समाज की खुशहाली के लिए भी कामना की जाती है | देवडंगरियों को पवित्र नदियों में स्नान भी कराया जाता है | बैसी मेें भक्ति कर रहे भक्त लोग केवल एक समय ही भोजन करते हैं तथा गांव के पारंपरिक शुद्ध जलस्रोतों , नौलों के जल से ही स्नान करते हैं शरीर में धोती (वस्त्र) धारण किया जाता है और नंगे पांव ही रहना पड़ता है पहाड़ों पर पूस के माह मे सबसे अधिक कपकपाने वाली ठंड होती है धरती पाले, ओस से सफेद चादर ओढ़े रहती है जिससे बैसी एक कठिन साधना बन जाती है | लोकदेवता के इन मंदिरों में गहरी आस्था का प्रतिक हैं आज गांव के इन मंदिरों समय समय पर होने वाले नवरात्रों , श्रावण बैसी, कठिन तिमासी (त्रैमासिक) व छः महिने तक निरंतर चलने वाली छःमासी का आयोजन भी इन लोकदेवता, आराध्य ईष्ट देवता के मंदिरों मे किया जाता है | जो इन मंदिरों में अटूट अगाध आस्था का प्रतिक है | लोकदेवता हरज्यू, गुरूगोरखनाथ, सैम ज्यू, न्यायी गोलूदेवता के मंदिरों मे बैसी में लगातार जलने वाली ज्योति (धूनि) जलायी जाती है जो निर्बाध रूप से लगातार बैसी (बाईस ) दिनों तक जलते रहती है | और इससे बनने वाली राख (बभूति) को भक्त एवं मंदिर में आने वाले भक्त लगाते हैं | आधुनिकता भले ही परवान चढ़ रही हो किंतु अगाध अटूट आस्था इन सब पर भारी है देवभूमि के गांवों में लोकदेवता गुरूगोरखनाथ, हरज्यू, सैमज्यू, भूमियां देवता, न्यायी गोल्जयू महाराज,नरसिंग (नार्सिंगं) आदि देवी देवताओं के मंदिरों में वर्ष भर चहल पहल बनी रहती है सम़य समय.पर नवरात्रों व कठिन साधना बैसी का भी आयोजन किया जाता है | देवभूमि में सदैव ही अटूट अगाध आस्था का संगम होता है | महान देवभूमि की परंपराऐं संस्कृति, सभ्यता व आस्था विश्वविख्यात है |

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