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Tuesday, 13 June 2017

15 जून को कैंची में उमड़ता है आस्था का सैलाब

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भुवन बिष्ट, रानीखेत , अल्मोड़ा देवभूमि उत्तराखण्ड सदैव ही अपार एंव अगाध आस्था का केन्द्र रही है,ऐसे ही अल्मोड़ा भवाली राष्ट्रीय राजमार्ग पर अपार श्रद्धा और आस्था का केन्द्र है बाबा नीम करौली महाराज का कैंची धाम मंदिर | जहां प्रतिवर्ष 15 जून को उमड़ता है भक्तों का सैलाब , यह आस्था का संगम देखने लायक होता है जब भक्त व्यवस्थित होकर अपने अगाध आस्था के केन्द्र कैंची धाम में दर्शन करते हैं | कैंची धाम स्थापना के बाद से ही जनमानस के लिए आस्था व श्र
ृद्धा का एक महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है | समय के साथ साथ बाबा नीम करौली महाराज के भक्तों की अपार आस्था बढ़ती गयी तो मंदिर के स्थापना दिवस ने बड़े महोत्सव का रूप ले लिया | देवभूमि उत्तराखण्ड देवों की तपोभूमि रही है, यही कारण है कि यहां श्रद्धा करने से फल भी मिलते हैं ,नीम करौली महाराज के प्रति जनमानस की अगाध आस्था इसलिए है क्योंकि वहां , जो भी भक्त सच्चे मन और दिल से मांगी गई सच्ची मुराद बाबा के आर्शिवाद से पूरी हो जाती है | शिप्रा नदी के तट पर स्थित बाबा नीम करौली महाराज के कैंची मंदिर की स्थापना के बारे में भी एक रोचक कथा है | कहा जाता है कि महाराज के मन में उठी मौज करने का विचार ही उनका संकल्प बन जाती थी | ऐसी ही मौज में बाबा ने शिप्रा नदी पर कैंची धाम की स्थापना कर दी | कहा जाता है कि लगभग वर्ष 1942 में कैंची निवासी एक व्यक्ति पूर्णानंद तिवारी सवारी के अभाव में नैनीताल से पैदल ही कैंची की ओर वापस लौट रहे थे, तभी एक स्थूलकाय व्यक्ति कंबल लपेटे हुवे अचानक नजर आया तो उन्हें देखकर पूर्णानंद डर गये | उस स्थूलकाय कंबल लपेटे व्यक्ति ने पूर्णांनद का नाम लेकर पुकारा और उनके वहां पहुंचने का कारण भी स्पष्ट रूप से बता दिया , यह स्थूलकाय कंबल लपेटे व्यक्ति ही स्वंय बाबा नीम करौली महाराज थे | जब बाबा से उन्होंने पूछा कि महाराज आपके दर्शन अब कब होंगे तो बाबा ने उत्तर दिया बीस साल बाद, यह कहकर बाबा नीम करौली महाराज अचानक ओझल हो गये | ठीक बीस वर्षो बाद एक दिन बाबा नीम करौली महाराज रानीखेत से नैनीताल की ओर तुलाराम साह व श्री सिद्धि मां के साथ जा रहे थे , तभी बाबा कैंची के उसी स्थान पर उतर गये और पैराफिट पर विश्राम करने के बाद उन्होंने वह स्थान देखने की इच्छा प्रकट की जहां पर सोमवारी महाराज व साधु प्रेमी बाबा ने वास किया | सन् 1962 में बाबा के पावन चरण उस भूमि पर रखे जहां वर्तमान में कैंची धाम मंदिर है, उस समय बाबा ने घास व जंगल के बीच घिरे चबूतरे व हवन कुंड को ढकने को कहा , इस स्थान पर वर्तमान में हनुमान जी का मंदिर है तथा पूर्व में सोमवारी बाबा का वास स्थान था | 15 जून सन् 1964 को हनुमान जी की मूर्ति की प्रतिष्ठा की गयी तब से पन्द्रह जून को प्रतिवर्ष प्रतिष्ठा दिवस के रूप में मनाया जाता है | भक्तों की सच्चे मन से मांगी गयी हर मुराद बाबा नीम करौली महाराज के कैंची धाम में पूरी होती है इसलिए अगाध आस्था के केन्द्र कैंची धाम में प्रतिष्ठा दिवस पर लाखों भक्त दर्शन करते हैं मंदिर के अंदर व बाहर भक्त व्यवस्थित होकर ऐसे चलते हैं मानो कोई दिव्य शक्ति उन्हें निर्देशित कर रही हो | देवभूमि उत्तराखण्ड में सदैव ही आस्था का संगम होता है |

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