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Tuesday, 30 May 2017

शिक्षा मंत्री के फरमान कितने व्यावहारिक ? पढ़िए यह विचारोत्तेजक लेख

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महेंद्र अग्रवाल ::प्रदेश में महज सियासी नफा नुकसान को ध्यान में रखकर शिक्षा मंत्रालय द्वारा जो नित्य नये-नये फरमान जारी किये जा रहे हैं उनसे गुणवत्ता तो दूर की बात है, ठीक ठाक शिक्षा की उम्मीद भी बेमानी है, उत्तराखण्ड के गठन से ही राज्य की साक्षरता दर राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर रही है, इसका श्रेय प्रदेश की निजी शिक्षण संस्थाओं को अधिक है प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद शिक्षा के क्षेत्र में किये जा रहे प्रयोग उसे पटरी से उतारने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं, प्रदेश के भविष्य से जुड़े शिक्षा जैसे सर्वोच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रत के प्रति सरकार का नया दृष्टिकोण निजी शिक्षा की गुणवत्ता के लिए उचित नहीं ठहराया जा सकता है, प्रदेश में अधिकांश प्राइवेट स्कूल सीबीएसई के है इन स्कूलों को सरकार अथवा सीबीएसई द्वारा किसी किस्म का आर्थिक सहयोग नहीं दिया जाता है स्कूलों की लागत प्रबंधकों की होती है, यही कारण है कि सीबीएसई द्वारा फीस के सम्बन्ध में स्पष्टता नहीं की गयी है मात्र निर्देश है कि स्कूल रिजनेवल फीस लेंगे, निजी स्कूलांे की बढ़ती संख्या के कारण एक ओर जर्बदस्त प्रतिस्पर्धा जैसी स्थिति होने लगती है दूसरी ओर तकनीक ने अभिभावकों को बहुत अधिक सक्षम बना दिया है वह बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाने से पहले ही स्कूल के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी हासिल कर लेते हैं, अभिभावकों के मानकों पर यह खरा उतरने के बाद कि स्कूल मंे सुविधाऐं कैसी हैं, प्लेसमेंट कैसा है और फैकल्टी कैसी है, बच्चों को प्रवेश दिलाया जाता है। निजी शिक्षा की गुणवत्ता ही कारण है कि आज मध्यम वर्ग के अभिभावक भी महंगी शिक्षा होने के बाद भी बच्चों को निजी स्कूल में दाखिला कराना चाहते है, इन स्कूलों पर किसी भी स्तर पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगने से शैक्षिक गुणवत्ता का क्या हश्र होगा यह सोचने की फुर्सत सरकार के पास नहीं है अब तक सरकारी शिक्षा के क्षेत्रों की स्थिति दयनीय हुआ करती थी इसका मुख्य कारण है कि इन क्षेत्रों में राजनैतिक दखलअंदाजी की संभावना बनी रहती है लेकिन अब निजी शिक्षा के क्षेत्रों में भी राजनैतिक दखल अंदाजी बढ़ रही है शिक्षा मंत्रालय के लिए बेहतर है कि वह सबसे अधिक ध्यान सरकारी विद्यालयों पर दे क्योंकि सरकारी शिक्षा के तंत्र में न तो विद्यार्थी होते हैं और न ही अध्यापक होते हैं, सरकारी विद्यालयों में जरूरी भौतिक संसाधनों के बढ़ाने के साथ ही शिक्षकों की उपस्थिति के मामले में भी संजीदगी दिखाने की आवश्यकता है, शिक्षा के क्षेत्रों का राजनीतिकरण चरम सीमा पर है और महकमे के लिए शिक्षकों, कर्मचारियों और अधिकारियों के तबादलों और विद्यालयों के सुगम और दुर्गम श्रेणीकरण के फेर से बाहर आना ही मुमकिन नहीं हो पा रहा है। सरकारी शिक्षा के क्षेत्रों में पहले ताबड़तोड़ तरीके से सरकारी जूनियर हाई स्कूलों और हाई स्कूलों का उच्चीकरण किया जाता है और साथ ही अशासकीय विद्यालयों को अनुदान देने का पात्र बना दिया जाता है इसके बाद विद्यालयों को अनुदान के स्थान पर टोकन ग्रांट देकर काम चलाया जाता है, आज की स्थिति में निजी शिक्षा के क्षेत्रों में जो अच्छे है वह आगे बढ़ सकते हैं, अन्यथा उन्हें परिणाम भुगतान पड़ेगा इसलिए इन क्षेत्रों में व्यवहारिक फरमान ही जारी किये जाने चाहिए।

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