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Wednesday, 3 May 2017

यशस्वी साहित्यकार ललित शौर्य का सत्ता प्रतिष्ठान पर करारा व्यंग्य:कड़ी निंदा विस्फोट

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ला है। ये कई तरीके से की जाती है। प्रायः निंदा मुंह से बोल कर की जाती है। निंदा भारतीय समाज में प्रचलन में है । पर निंदा शास्त्र सम्मत नहीं है। शास्त्रों में निंदा को बुरा माना गया है। पर वहीँ कई विद्वानों ने निन्दक को नियरे रखने की बात कही है। बड़ा विरोधाभास है निंदा करनी नहीं है , वही निंदक को पास भी रखना है। खैर, इन बातों में नहीं उलझना हमको। वैसे भी लिखने को क्या नहीं लिखा गया है। पर कोई अमल तो करे। हमारे देश में प्राचीन समय से ही निंदक वीर रहे हैं जिन्होंने समय -समय पर अपनी निंदा से शत्रुओं की चूले हिला दी, उनके दुर्ग ढहा दिए। उनकी वाक् निंदा विस्फोट से अनेकों अक्षौहुणी सेना नष्ट हो जाया करती थी। आज भी सत्ता में अनेक ऐसे नेता हैं जिनकी कड़ी निंदा से पापी पाकिस्तान की सेना कांपने लगती है। कई दशकों से देश का रक्षा मंत्रालय एवं गृहमंत्रालय में कड़ी निंदा एक्सपर्ट को ही बिठाया जाता रहा है। जो अलग-अलग स्टाइल में नक्सलवाद और आतंकवाद की निंदा करते आये हैं। वो अपनी कड़ी निंदा का बखान प्रेस वार्ता एवं विभिन्न माध्यमों से करते आये हैं। मौन सरकार में भी मुखर होकर कड़ी निंदा की गई। कड़ी निंदा से ही सैनिकों की कई टुकड़ियां ध्वस्त की गई। नक्सलवाद का सफाया किया गया। ठीक उसी रास्ते पर चलते हुए 56 इंची सरकार भी छोटी निंदा, बड़ी निंदा, कोमल निंदा, कठोर निंदा सभी आजमाकर अब कठोर निंदा पर उतर आई है। अब लगता है हमारे सैनिकों के सर कटने बंद हो जाएंगे। उनके साथ बर्बरता से पापी पाकिस्तान बाज आएगा। सैनिकों के साथ अभद्र व्यवहार करने वाले नादान कश्मीरी बच्चे होश में आएंगे। गृह मंत्री भी नक्सली हमले के बाद कड़ी निंदा में उतर आये हैं। अब नक्सलियों की सामत निश्चित है। क्योंकि गृह मंत्री साहेब उंगलियां घुमा-घुमा के कड़ी निंदा करते हैं। उनके इस स्टाइल से देश भी गोल-गोल घूमने लगा है। मौन सरकार, फिर छप्पन इंची सरकार अंतर कहीं नहीं है । दोनों जगह सैनिकों के सर कटते रहे। और ये निन्दाओं के विभिन्न प्रकारों का चयन करते रहे। कभी स्वदेश तो कभी विदेश में जाकर निंदा करते रहे। वैसे एक बात कहूँ , "निंदा करने के लिए , जिन्दा रहना जरूरी है साहब" । जिन्दा रहियेगा ,तो ही तो निंदा करिएगा ना। तो अब दे भी दो जिन्दा होने के सबूत। वैसे भी विपक्ष सबूत ही तो मांगता है। निंदा की परिभाषा बदलिए जी। नहीं तो छप्पन इंची से सरकार का माप कुछ कम कर दीजिए। खा मु खा दिक्कत होती होगी सम्हालने में। तो जागिये निंदा नहीं एक्शन लीजिये।

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