"खटीमा (उत्तराखंड) से प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र"

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Tuesday, 16 May 2017

उत्तराखंड का महत्वपूर्ण फल है कांफल

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देवभूमि उत्तराखण्ड अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए सदैव ही विश्वविख्यात रहा है , और इसके खूबसूरती पर चार चांद लगाने का काम करते हैं यहां के वन | देवभूमि के हरे भरे वन स्वच्छ हवा व स्वच्छ जल देने के साथ साथ अनेक स्वादिष्ट फलों का उपहार भी जनमानस को देते हैं, खूबसूरत जगलों का श्रृंगार प्रकृति के उपहार से होता है, वनों की शोभा बढ़ाता बुरांश हो या फिर चैत के महिनों में पेड़ों पर लदगद होकर अपनी लालिमा बिखरने वाला हिमालयी फल काफल | काफल तीन हजार से छः हजार फिट की ऊंचाई वाले स्थानों जो कि ठंडी व छायादार हो ऐसे स्थानों में पाया जाता है | काफल के लदगद पेड़ इन दिनों सभी को अपनी ओर बरबस आकर्षित करते है और हर कोई इसका स्वाद लेने के लिए तैयार रहता है | चैत महिने से तैयार होने वाले फल काफल इस समय बड़े पैमाने पर अनेक परिवारों, लोंगो का रोजगार का साथन भी बना रहता है क्योंकि इस समय पर्यटन सिजन भी चरम सीमा पर होता है, जंगलों की शान व शोभा बढ़ाने वाला काफल विशुद्ध रूप से एक जंगली फल है | इसकी विशेषता है कि इसका पौधा अपने बीज से नहीं पक्षियों के बीट से तैयार होता है | काफल की महत्ता का गुणगान एंव खूबियों के चलते गायक गोपालबाबू गोस्वामी ने अपने गीत "बेडू पाको बारमासा, ओ नैरण काफल पाको चैता , मेरी छैला" ने अपनी मधुर व अनमोल आवाज से इस जंगली फल को हरेक की जुबां का मिठास बना दिया | काफल का वानस्पतिक नाम मैरिका एस्कुलैंटा व इसका आयुर्वेदिक नाम कायफल है | काफल 3000 हजार से 6000 हजार फिट की ऊंचाई के साथ साथ छायादार व ठंडी जगहों में पाया जाता है काफल के पौधे का परागण प्रकृति ने पक्षियों को सौंपा है, इसलिए इसके बीज से पौधा अंकुरित नहीं होता है काफल के गुठली पर एक लाल रंग की बाहरी परत(फल) होती है इसी परत (फल) को खाया जाता है, काफल के वृक्ष की एक सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि इसकी गुठली से लेकर पूरा वृक्ष ही औषधिय गुणों से भरा हुआ है | काफल के पेड़ो पर फरवरी से फल आने शूरू हो जाते हैं, मई तक इसके दाने पककर लाल हो जाते हैं, जुलाई तक काफल के वृक्षों पर काफल से लकदक हो जाते हैं | मौसम का प्रभाव व वनों में दावानल की बढ़ती घटनाऐं भी काफल के उत्पादन पर काफी हद तक निर्भर होती है | आयुर्वेद में काफल को मेडिसनल प्लांट का स्थान मिला हुआ है, इसके पेड़ की छाल में मायरीसिटन , मायीसिट्रीन, ग्लायकोसाइड जैसे औषधिय तत्व पाये जाते हैं | इसकी छाल से दातून व इसकी गुठली चूर्ण व तेल बनाने के काम आती है | काफल भूख की अचूक दवा व मधुमेह रोग के लिए भी इसे कारगर माना जाता है | काफल के संबध पर उत्तराखण्ड में एक लोककथा मशहूर है माना जाता है कि सूदुर एक घनघोर जंगल के बीच में एक पहाड़ी थी, और उस जंगल के पास के गांव में एक औरत अपने इकलौते बेटे के साथ उस घर में रहती थी | महिला बहुत ही गरीब थी और कई दिनों तक अनेक बार उसे बिना खाये ही दिन रात बितानी पड़ती थी | ऐसी विषम परिस्थतियों में मां बेटे के पेट का सहारा केवल जंगली फल ही हुवा करते थे | एक बार महिला जंगल से काफल तोड़ कर ले आई, और काफलों से भरी टोकरी बेटे के सामने रखकर कहा कि बेटा इनकी हिफाजत करना और महिला खेतों में काम करने के लिए चली गयी , और जब महिला खेतों से लौटी तो उसे टोकरी में काफल कम दिखे, क्योंकि धूप के कारण टोकरी में काफल सूख चुके थे | उस महिला को लगा कि बेटे ने काफल खा लिये हैं, तो उसने क्रोध में आकर एक बड़ा सा पत्थर फेंका जो बच्चे के सिर पर लग गया, और बच्चा मर गया | काफल की टोकरी बाहर पड़ी रह गयी, दूसरे दिन बारिश हुई तो टोकरी में काफल भीगकर फूल गये और टोकरी पहले की तरह काफल से भर गयी | जब महिला ने यह देखा तो वह अचंभित रह गयी और उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और जीवन भर पश्चाताप करती रही , माना जाता है कि वह बच्चा जिसका मन पवित्र था , आज भी घुघुती पक्षी के रूप में आता है, और आवाज लगाता है, "काफल पाको मिल निं चाखो" अर्थात काफल तो पक गया पर मैंने चखा नहीं | आज वनों के अत्यधिक दोहन से बहुत गुणकारी वृक्ष काफल की संख्या घटते जा रही है | अनेक स्थानों में काफल को कायफल के नाम से भी जाना जाता है | आज पहाड़ के अनेक क्षेत्रों मे रोजगार का साधन बनता काफल व औषधिय बहु गुणकारी काफल के वृक्षों को संरक्षित किये जाने की आवश्कता है | भुवन बिष्ट ,रानीखेत (अल्मोड़ा)

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