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Friday, 21 April 2017

कहाँ चले गए गिद्ध : पूरन सिंह कार्की

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यह एक सच्ची कहानी है। हमारे अपने समय में यह कहानी घटी जिसने एक पल के लिए हमें सोचने को विवश कर दिया। हमारे बाद की आने वाली पीढ़ी इसे केवल कहानी ही मान सकेगी जब कि हमारे लिए यह एक दुःखदायी याद बन चुकी है। यह कहानी है दुनियां से गिद्धों के विलुप्त हो जाने की। पक्षी विशेषज्ञों के लिए गिद्धांे का विलुप्त हो जाना एक रहस्य बना हुआ है। मुझे याद आता है हमारे देश के पर्वतीय भागों, स्वच्छन्द वादियांे तथा बीहड़ जंगलो के ऊपर ऊँचे आकाश में बड़े-बड़े गिद्ध स्वतन्त्र विचरण करते थे । मैने अपने जीवन में विशाल पंखो वाले भद्दभदाकार गिद्ध देखे हंै। इनमें से अधिकांश हमारे महानगरों के किनारे पड़े रहने वाले मृत जानवरांे के शवों के ऊपर मंडराते, उनको खाने के लिए एक दूसरे से जद्दोजहद करते हुए दिखाई देते थे। मैदानों व पहाड़ की तलहटियों में सड़कों के किनारे मृत पशुआंे के शवों के ऊपर तेजी से उड़कर उन पर टूट पड़ते थे। मृत पशु का शव कुछ ही देर में कंकाल नजर आता था। सदियों से हमारे पर्यावरण में घुल मिलकर रहने वाले ये पंछी शरद ऋतु में भारतीय जंगलों में ऊचे सेमल, जामुन, शीशम, साल व हल्दू के वृक्षांे पर घोंसले बनाकर प्रजनन कार्य करते थे। इनकी चींखे भी निहायत कड़कदार होती थी। गिद्ध की ही प्रजाति के बाज को बड़े बड़े लोग शौक से अपने घरों में रखते थे। कुमायँूनी राजपूत राजा अपने यहां बाज पालते थे। सन् 1998 के बाद गिद्धों का दिखाई देना कम हो गया। अब तो गिद्धों के बारे में कोई चर्चा तक नहीं करता कि इनको आखिर क्या हुआ। इनकी प्रजनन शक्ति को क्या हुआ? आंधी तूफान, अत्यधिक गर्मी तथा वायुमण्डल में उद्योगों कलकारखानो से निकलने वाले हुए धुंए तथा जहरीली गैसांे के कारण भी शायद इनके जीवन पर दुष्प्रभाव पड़ा हो। गिद्धांे की गिरती व विलुप्तप्रायः होती स्थिति मानव जीवन व पर्यावरण दोनो ही के लिए चिन्ता का विषय है। मानव ने इस घटना को गंभीरता से नहीं लिया। जिस जलवायु में गिद्ध पलकर बड़े होते थे, उसमें भी तेजी से परिवर्तन हुए। बीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षो तथा इक्कीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशक में वनों का अत्यधिक दोहन, औधोगीकरण व नगरीकरण के साथ साथ भू-मण्डल के बढ़ते तापमान ने इस प्रजाति के लिए रहने की प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा कर दीं। अत्यधिक धुंध, कोहरा व असामयिक वर्षा व कहीं कहीं सूखे ने भी इनकी सेहत को बिगाड़ा। जिन वन क्षेत्रों में केवल जीवजन्तु ही रहते थे वहां पर औद्योगिक इकाइयों के स्थापित होने तथा मानव आवास बन जाने के कारण इनके रहने के क्षेत्र सिकुड़ गये । साथ ही वनस्पति जगत तथा वायुमण्डल दोनों का मिजाज भी गड़बड़ा गया। जंगलों में लगने वाली आग से इन पक्षियों के अण्डे़ बच्चे मय घोसलें जलकर नष्ट हो गये। मोटर गाड़ियांे, कलकारखानांे से निकलने वाले धुयें तथा उत्सर्जित गैसों से वातारण में प्रदूषण बढ़ता चला गया। पिछले कुछ वर्षो में एक के बाद एक परमाणु विस्फोट से धरातल के ऊपर पहुँचने वाली रेडियोधर्मी किरणों ने गिद्धों के आश्रयों को नुकसान पहुँचाया। आकाश को अनेकों वायुयानों, हेलीकाॅप्टरों ने अपने लिए मानो आरक्षित कर लिया। पृथ्वी से अंतरिक्ष में भेजे जा रहे राॅकेट, उपग्र्रह व युद्धांे के दौरान देशों के बीच दागी जा रही मिजाइलों व आग्नेयाश्त्रांे से वायुमण्डल में धमाके व कंम्पन हुए हैं। बदलती परिस्थितियों में पक्षियों के पीने का पानी भी प्रदूषित होता चला गया। इन दो दशकों में गिद्धों की प्रजाति को एक नाजुक दौर से गुजरना पड़ा है। मैंने जम्मू-कश्मीर, हिमाचलप्रदेश, उत्तराखण्ड तथा उत्तर प्रदेश के पर्वतीय, भाबरी एवं मैदानी इलाकांे व वनों का भ्रमण किया परन्तु एक भी विशालाकाय गिद्ध देखने को नही मिले जो कभी आज से बीस पच्चीस वर्ष पूर्व दिखाई देते थे। पक्षी प्रेमियों के लिए एक अच्छा समाचार है कि स्टेपे नामक गिद्धों के अवशेष माउण्ट एवरेस्ट पर 7500 मीटर की ऊँचाई पर पाये गये हंै। गिद्धांे से जहाजों के टकराकर दुर्घटना ग्रस्त हो जाने की घटनायें भी होती रही हैं। एक बार ग्रिफिन नामक प्रजाति का एक गिद्ध भूमि सतह से आश्चर्य जनक रूप से 10,800 मीटर ऊपर एक हवाई जहाज से टकरा गया था। कुछ भी हो गिद्ध हमारी दुनियाँ के सुन्दर व विशालकाय पक्षी थे हमने अपने समय में इन्हें कई रूप रंगों में देखा । हमारे बीच से इनका अचानक चला जाना एक दुखद याद ही रह गयी है। कारण कुछ भी रहा हो इनके यौं चले जाने का, परन्तु कुछ समय पहले यह समाचार भी मिला था जिसमें कहा गया था कि-‘The vultures are dying off after eating cattle carcasses dosed with diclofenac an anti inflammatory used to relieve fever in livestock.’ ‘बुखार को शान्त करने के लिए सूजनरोधी डाईक्लोफेनेक में डुबायें गये शवों को खाने के बाद गिद्ध मरते जा रहे है।’ गिद्धो की बिलुप्त प्रायः होती प्रजाति को बचाया जाना चाहिए। (पूरन सिंह कार्की)

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