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Thursday, 27 April 2017

ललित शौर्य का व्यंग्य : बत्ती गुल

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बत्ती गुल चारों तरफ शोक की लहर है। राजनैतिक गलियारों में अजीब सा मातम छाया हुवा है। ना रोते बन रहा है, ना हँसते, ना बोलते बन रहा ना सहते बन रहा है। दिल का दर्द अंदर ही अंदर कचौट रहा है। ये दर्द उनसे पूछो जिनकी तमाम उम्र नारे लगाने में बीत गई। जिनकी चाहत एक लाल बत्ती थी। जो सपने में लाल बत्ती की लालिमा से गदगद हो उठते थे। लहलहाती खेत से जिस तरह किसान को सकून मिलता है ठीक उसी तरह लालबत्ती नेता जी को अनिर्वचनीय आनन्द की अनुभूति कराती थी। एक लाल बत्ती सारी पीड़ाओं की दवा थी। साथी नेता को जलाने, जनता पर रौब जमाने, विपक्ष को भौकाल दिखाने क्या-क्या काम नहीं करती थी लाल बत्ती। ये केवल बत्ती नहीं थी नेताजी के शरीर में व्याप्त ऊष्मा थी, नेतागिरी का प्राणतत्व थी। सारी भागम-भाग लड़ाई -झगड़ा, चुनावी गाली -गलौज, मार-धाड़ इस परम पुनीत लाल बत्ती के लिए ही तो थी। ये जब गाड़ी के ऊपर चमकती थी ऐसा लगता मानों नेताजी सूरज को ललाट पर लिए घूम रहे हैं। तब घूमने का भी और ही आनंद था। ये केवल बत्ती नहीं थी बल्कि सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम करने की चाबी थी। नेताजी को पद से नहीं बत्ती से प्यार था। वो तो नेतागिरी में आये ही बत्ती के लिए थे। वरना पैसा तो वो पहले भी दबा के कमा रहे थे। एक बत्ती ही तो थी जो राजनीति में आकर्षण का केंद्र थी। लोग बत्ती की ही तो कद्र करते थे। वैसे भी नेता तो ना पहले पूछे जाते थे ना अब पूछे जाएंगे। पूछा तो बत्ती को जाता है। सम्मान तो उस लाल कटोरे का था। हाय रे , बत्ती तू कितनों के अरमानों की बत्ती गुल कर गई। सैकड़ो नेता खुद को कोस रहे हैं जब बत्ती ही नहीं तो किस बात की नेतागिरी। नेताजी के साथ - साथ साहब लोग भी आत्मग्लानी से भरे हुए हैं। जब बत्ती ही कटनी थी तो आखिर पढ़ने-लिखने में इतनी मेहनत क्यों की। इस बत्ती के चक्कर में सारी जवानी किताबों में उढ़ेल दी, आँखों का कोरमा बनाया, कमर झुक गई। तब कहीं जाकर मिली थी निर्मोही बत्ती। पर अब ये भी छोड़ के चली गई।बत्ती के लिए नेताजी की बड़े नेताओं की वो अहर्निश चमचागिरी आज कुएं में जा डूबी। आज फायर बिरगेड और एम्बुलेंस के चालक अपने को धन्य समझ रहे हैं जिनके ऊपर बत्ती गुल का कोई असर नहीं हुवा। वो मन ही मन खिले हुए गुलाब हो रहे हैं। नेताजी और अधिकारी उनकी बत्ती देखकर कुढ़े हुए हैं। उन्हें फायर बिरगेड की लाल बत्ती जले में नमक जैसी अनुभूति करा रही है। वैसे ये लाल बत्ती केंद्र से कटी है। बत्ती गुल की जिम्मेदारी केंद्र के लाल ने ली है। ये वहीँ हैं जिनका आजकल नया नारा ट्रेंड में है , "ना बत्ती लगाऊंगा, ना लगाने दूंगा"। बत्ती गुल के मुखिया सबकी बत्ती काट कर नेताओं को जनसेवा का पाठ पढ़ा गये। पर इस मास्टर का ये अध्याय किसी भी बत्ती लोलुप को पसंद नहीं आया। अब तो बत्ती प्रेमी नेता और अधिकारी फायर ब्रिगेड और एम्बुलेंस सेवा के वाहनों में भर्ती होने की संभावना खोज रहे हैं। ललित शौर्य प्रदेश मंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद

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