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Sunday, 5 March 2017

कुमाउनी सम्पन्नता के अवशेष - पूरन सिंह कार्की

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वर्तमान कुमाऊंनी पीढ़ी को अपने अतीत की ओर झांकने में तनिक भी रूचि नहीं है। जब देश के अन्य भागों में सभ्यता व संस्कृति का विकास हो रहा था, कस्बे व नगर बस रहे थे, उस समय कुमाऊंनी पुरखे पहाड़ के एक बड़े भाग पर निश्छलवादियों में बसे हुए थे तथा कुछ अन्यत्र निश्चित क्षेत्रों में यत्र तत्र आकर बसने लगे थे। यूं तो कुमाऊं में आक्रमणकारियों ने अनेक बार विध्वंस किये परन्तु हमारे बुद्धिमान, दूरदर्शी व सामरिक दृष्टि से जागरूक पूर्वजों ने अपनी कला, स्थापत्य का जो रूप प्रस्तुत किया था उसके खण्डहर व अवशेष या तो वीरान हो गये हैं या फिर आज कहीं-कहीं कुमाऊं के दुर्गम स्थानों में देखे जा सकते हैं। ये याद दिलाते हैं कुमाऊं के एकदा सम्पन्न अतीत का-जब कुमाऊं पश्चिमी भाग से आने वाले प्रवासी हम वतनों, पूर्वोत्तर व पश्चिमोत्तर से हमारे पड़ोसी देशों से समय-समय पर पिछली अनेकांे शताब्दियों में आने वाले लोगों की युद्धस्थली बना।

तब मध्ययुगीन परंपरा प्रणाली से लड़े जाने वाले युद्धों में बल्लम, तलवार, खुकरी, पाटल, डागर तथा हल्के पैने देहाती शस्त्रों का प्रयोग होता था। इन हमलों से रक्षा करने के लिए तत्कालीन कुमाऊंनी शासकों, राजाओं, जमीदारों आदि ने किले बनवाये थे। कुमाऊं में पहले 2500 वर्ष ईसापूर्व पुरूषवंशीय राजाओं का राज था।

उदाहरण के लिए वैराटनगर (वैरा पट्टन) में जिसके बारे में कहा जाता है कि यह रामनगर का प्राचीन नाम था। कुरूवंश के राजाओं का यहां पर राज था, कत्यूरी शासक कुरूवंश के राजाओं के बाद यहां पर आये। उधर पाली परगना जिसे कभी पहाड़ की सम्पन्नता के लिए जाना जाता था, राजस्थान के चित्तौरगढ़ से भाग कर आये लोगों द्वारा बसा था।

पाली के कत्यूरवंश का शासक ही पाली का अंतिम शासक था। चंद शासकों ने इस राजा को हराया, और स्वयं शासक बन गये। कत्यूरियों को यहां से भाग कर जाना पड़ा। बारामण्डल में 12 मण्डल थे और 12 मण्डलिक राजा यहां पर रहते व राज करते थे। ये मण्डल राजाओं के आपसी युद्धों में एक दूसरे के पास जाते रहे। बारामंडल के कुछ इलाकों में कत्यूरी राजा बैचल देव या बैजलदेव ने भी राज किया था।

अल्मोड़ा के पास खगराकोट का किला है। यहां पर इस राजा का महल था। चंदों ने इस राजा को लड़ाई में हराया और बारामंडल छीन लिया। शासन को सुगम तरीके से चलाने के लिए राजाओं ने अपनी राजधानी सुरक्षित स्थानों पर बनायी ताकि उनके, किलों के भीतर राजशी (शाही) परिवारों की सुरक्षा हो सके। कत्यूरी राजाओं ने अस्कोट में प्राचीन राजधानी बनायी थी। यहां लखनपुर कोट में कत्यूरी रहते थे। अब केवल स्मारक बनकर रह गया है। इसी के पास बगड़ी नामक बाजार भी अब नहीं रही। राजाओं द्वारा कई परगनों व पट्टियों में किले बनाये गये।

कत्यूरी राजाओं ने फल्दाकोट परगने में भी राज किया था। यहां फल्दाकोट को किला है। किसी जमाने में परगना धनियाकोट में बहुत किले हुआ करते थे। समय ने करवट बदली। पुराना सब मिट गया। इनमें से कई कोट व किले जैसे तल्लाकोट, मल्लाकोट, मजकोट, बुधलाकोट, में गांव बस गये हैं।

दानपुर में शुभगढ़ में भगवती ने शुंभ-निशुंभ दैत्यों को हराया और मारा था। शुभगढ़ नामक गांव में शुभ देव के किले पर दैत्य देवी जी से लड़े थे। किले हमारे कुमाऊंनी शासकों के जन व धन की भी रक्षा करते थे। कत्यूरी सम्पन्न शासक थे। वे गोपालकोट तथा रणचुला किले में अपना खजाना रखते थे। चंद शासक तो अपनी सेना भी इन्ही किलों में रखते थे। रणचुला तो नाममात्र को है भी लेकिन गोपाल कोट का किला पिछली शताब्दी में ही नष्ट हो चला था। वहां पर केवल पहाड़ ही रह गया। स्यूनरा में स्यूनकोट का किला ऊँचे टीले पर बना हुआ था। ऐसे ही तिखौन कोट में एक चोटी पर किला था-चंद शासकों ने इसे जीतने के लिए आक्रमण किया लेकिन वे आगे सफल नहीं हुए और पराजित होकर लौट गये। कोटा के पास शीतेश्वर में तीन गढ थे। कमोला, धमोला में भी कभी राजा रहे होंगे क्योंकि वहां जीर्ण-क्षीर्ण इमारतें पिछली शताब्दी तक थीं। तराई में भी कुमाऊंनी राजाओं ने अपने किले बनाये। कत्यूरियों के जमाने के खण्डहर तराई में आज भी जमीन में दबे हुए हो सकते हैं। सन् 1489 में राजा ने एक किला बनवाया। इसका नाम कीर्तिपुर रखा गया था। इधर शिवालिक श्रेणियों की तलहटी में काठगोदाम से दक्षिण पूर्व की ओर टनकपुर को जाती पर्वत श्रृंखला में कुछ दूरी पर गौलापार के ऊँचे टीले में मध्यम अक्षांश पर राजा विजय चंद कुमाऊं के राजा की गढ़ी थी।

17वीं शताब्दी में 1625 ई. को यह राजा विजय चंद संग्राम सिंह कार्की पीरू गुसाई व विनायक भट्ट द्वारा मार डाले गये। उनकी गढ़ी वीरान हो गयी। इस स्थान पर वर्तमान में बिजेपुर गांव बसा हुआ है। 17वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षो में राजा दिलीप चंद (1621-24) के सोर के बन्दोबस्ती अधिकारी पीरू गुसाई ने एक रमणीक जगह पर पिथौरागढ़ किला बनवाया था। गढ़ या किले का यह जीता जागता नाम वर्तमान पिथौरागढ़ नाम से आज भी विद्यमान है। ंचंपावत में 1000 वर्ष पुराना राजबुंगे का किला स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना था। 1999 में यह प्राचीन स्मारक ढह गया। ऐसे ही और भी अनेक किले व कोट हैं जिनके बारे में लिखना कठिन है।

अब मैं बाजारों व हाटों की ओर लौटता हूँ। बीर भट्टी में एक मनोरम बस्ती थी,  लगभग 200 वर्ष पहले पहाड़ टृट जाने पर यह उजड़ गयी। अब नयी बस्ती पुरानी जैसी नहीं है। चंद राजाओं के समय से रानीबाग के पास गुलाबघाटी के पश्चिम में शीतला देवी की पावनस्थली है। यहां पर चंद राजाओं के समय में शीतलाहाट बाजार था। गोरखों ने जब कुमाऊं में तहस-नहस आंरभ किया तो यहां की बाजार को भी उजाड़ दिया था। लखनपुर के पास गिवाड़पट्टी में कलिरोहाट नामक बाजार था। यह भी समय की भंैट चढ़ गया। हल्द्वानी में मंगलपड़ाव में मंगल के दिन बाजार लगती थी। तथा दूर-दूर का व्यापारी वर्ग व क्रेता दिखाई देते थे।

आज सभी दिन बाजार के हो गये हैं। हल्द्वानी अपने आप में पूरे कुमाऊं का सबसे बड़ा जीता जागता दैनिक बाजार है। इसकी माटी में भी आज अनेकों पुराने भवन खण्डहर होते जा रहे हैं। ऐसे ही और भी अनेक रूपों में हमारा अतीत खोया व बिखरा या सदा के लिए अज्ञात गर्भ में चिल्लापुकार कर हमारी आंखों के संपर्क में आने से पहले ही ओझल हो चुका है।

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  1. इतनी अच्छी जानकारी के लिए आपका आभार । सही बात है कुमायूँ के लोगो को अपने इतिहास में रूचि नही है । जबकि होनी चाहिए बहुत कम है कुमायूनी लोगो के पास गर्व करने को ।एक बार फिर धन्यवाद धर्मबीर ठाकुर

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