"खटीमा (उत्तराखंड) से प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र"

BREAKING NEWS:-देवभूमि का मर्म आपका हार्दिक स्वागत करता है

Friday, 6 March 2015

क्या यही हैं "अच्छे दिन" ?

No comments :

क्या यही हैं "अच्छे दिन" ?

अजय नारायण शर्मा

संसद के अंदर ही नहीं संसद के बाहर भी सरकार जमीन अधिग्रहण बिल पर घिरती नजर आ रही है। सरकार की मुश्किलें बढ़ाने के लिए अन्ना हजारे भी मैदान में कूद गए हैं। अन्ना ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के विरोध में जंतर मंतर पर 2 दिन के अनशन ने और अन्ना आंदोलन को दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के अलावा कई और पार्टियों के नेताओं से समर्थन मिलने के कारण सरकार की मुश्किलें बढती जा रही है। 22 किसान संगठन,  और मेधा पाटकर जैसी एक्टिविस्ट अन्ना के अनशन का समर्थन कर रहे हैं।  दरअसल अच्छे दिन लाने का वादा करने वाले नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार की छवि एक धोखेबाज की बनती जा रही है। अब तक के कार्यकाल में मोदी सरकार पूंजिपतियों की ही शुभचिंतक बनती दिखी है। आम जनता के हितों के लिये सरकार  की योजनायें/घोषणायें केवल नौंटकी ही साबित हो रही हैं। साल की शुरुआत ही नरेन्द्र मोदी ने देशी-विदेशी पूँजीपतियों के स्वागत में कुछ और लाल गलीचे बिछाने से की थी। मौका था  ‘वाइब्रेंट गुजरात’ और ‘प्रवासी भारतीय सम्मेलन’ का। गुजरात में आयोजित इन दोनों सम्मेलनों में पूँजीपतियों को लुभाने के लिए मोदी ने उनके सामने ललचाने वाले व्यंजनों से भरा पूरा थाल बिछा दिया गया था– आओ जी, खाओ जी! श्रम क़ानूनों में मालिकों के मनमाफिक बदलाव, पूँजीपतियों के तमाम प्रोजेक्टों के लिए किसानों-आदिवासियों से ज़मीन हड़पने का पूरा इन्तज़ाम, कारख़ाने लगाने के लिए पर्यावरण मंज़ूरी फटाफट और बेरोकटोक करने की सुविधा, तमाम तरह की सरकारी बन्दिशों और जाँच-पड़ताल से पूरी छूट, सस्ते से सस्ता बैंक ऋण और टैक्सों में छूट। यानी ‘ईज़ ऑफ़ बिज़नेस’ (बिज़नेस करने की आसानी)! 26 जनवरी को मुख्य अतिथि बनकर आ रहे साम्राज्यवादी लुटेरों और हत्यारों के सबसे बड़े सरगना अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की यात्रा से पहले बीमा क़ानून से लेकर भूमि अधिग्रहण क़ानून तक अध्यादेशों के ज़रिये बदल दिये गये थे ताकि विदेशी लुटेरों को भरोसा दिलाया जा सके कि हिन्दुस्तान के लोगों की मेहनत और यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने में उनकी राह में कोई रुकावट नहीं आने दी जायेगी। मोदी सरकार का अब तक का कार्यकाल जनता के बुनियादी अधिकारों की कीमत पर देश के शोषक वर्गों के हितों को सुरक्षित करने और उन्हें तमाम तरह से फायदे पहुँचाने के इन्तज़ाम करने में ही बीता हैं। आम अवाम के लिए ‘अच्छे दिन’ न आने थे और न आये, लेकिन अपने पूँजीपति आकाओं को अच्छे दिन दिखाने में मोदी ने कोई कसर नहीं उठा रखी। मज़दूरों और ग़रीबों की बात करते हुए सबसे पहला हमला बचे-खुचे श्रम अधिकारों पर किया गया। पहले राजस्थान सरकार ने घोर मज़दूर-विरोधी श्रम सुधार लागू किये और उसी तर्ज़ पर केन्द्र में श्रम क़ानूनों में बदलाव करके मज़दूरों के संगठित होने तथा रोज़गार सुरक्षा के जो भी थोडे़ अधिकार कागज़ पर बचे थे, उन्हें भी निष्प्रभावी बना दिया। योजना आयोग को ख़त्म करके बने नीति आयोग का उपाध्यक्ष जिन अरविन्द पनगढ़िया को बनाया गया है वे ही राजस्थान की भाजपा सरकार के श्रम सुधारों के मुख्य सूत्रधार रहे हैं। पनगढ़िया महोदय सारा जीवन अमेरिका में रहकर साम्राज्यवादियों की सेवा करते रहे हैं और खुले बाज़ार अर्थव्यवस्था तथा श्रम सम्बन्धों को ‘लचीला’ बनाने के प्रबल पक्षधर हैं। इससे पहले मुक्त बाज़ार नीतियों  के एक और पैरोकार अरविन्द सुब्रमण्यन को प्रधानमंत्री का मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया जा चुका है।  मोदी सरकार के तमाम पाखण्डपूर्ण दावों के बावजूद सच यही है कि यह उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों को मनमोहन सरकार से भी ज़्यादा ज़ोरशोर से लागू करेगी और इनसे मचने वाली तबाही के कारण जनता के असन्तोष को बेरहमी से कुचलेगी तथा लोगों को आपस में लड़ाने के लिए साम्प्रदायिक फासीवादियों के हर हथकण्डे का इस्तेमाल करेगी। यह भू
-अधिग्रहण अध्यादेश भी देश  की संसदीय जनतांत्रिक प्रणाली पर किया गया आघात है क्योंकि ये अध्यादेश संसद में बिना चर्चा कराये दोनों सदनों (राज्य सभा व लोकसभा) के सत्रावकाश के दौरान चोर दरवाजे से उस समय लाये गए हैं जब अगले दो महीने में ही संसद के सत्र चलेंगें। ये अध्यादेश भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 की घोर अवमानना का निर्लज प्रदर्शन हैं जो कहता है कि इस प्रकार के अध्यादेश केवल विशेष परिस्थितियों या आपातकालीन स्थितियों में लाये जा सकते हैं। 
भारतीय संविधान के अनु 39 B में प्राकृतिक संपदाओं पर देश के नागरिकों के अधिकार को परिभाषित किया गया है। लेकिन नया भू-अधिग्रहण अध्यादेश भारतीय संविधान के विरोध में खड़ा होते हुए प्राकृतिक संसाधनों को कंपनियों के हवाले कर देने के और अग्रसर है। इसलिए अध्यादेश जन विरोधी होने के साथ-साथ संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है।  
सरकार ने इन अध्यादेशों के जरिये एक ही झटके में जल, जंगल, जमीन ओर खनिज पर लोगों को प्राप्त हुए सिमित अधिकार को ख़त्म करते हुए कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण के रास्ते को बहुत ही आसान बना दिया है। किसानों और मज़दूरों के लिए ज़मीन का मामला उनके अस्तित्व से जुड़ा होता होता है, इसलिए उन्होंने भारत की सडकों पर अपने अस्तित्व और रोजी रोटी की खातिर बरतानिया हुकूमत द्वारा बनाये गये सन् 1894 के भू-अधिग्रहण कानून को बदले जाने के लिए खून बहाया, और आदिवासियों तथा किसानों के ढेरो आंदोलनों और कुर्बानियों के बाद पिछली सरकार “भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनव्यर्वस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार कानून, 2013 ” नाम से औपनोवेशिक भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव लाने के लिए बाध्य हुई थी।
हालाँकि संशोधित कानून भी जमीनों को अधिग्रहित करने का ही कानून था जमीनों को बचाने का नही, फिर भी वह कानून भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में संविधान के तहत स्थापित स्थानीय स्वशासी संस्थाओं और ग्रामसभाओं से परामर्श लेने तथा 70% किसानों के सहमती के प्रावधानों को रखता था। उस कानून में भूमि अधिग्रहण से पहले विकास परियोजनाओं के सामाजिक प्रभाव के अध्ययन का उल्लेख था और कहा गया था कि भूमि अधिग्रहण का कुल परिणाम ऐसा होना चाहिए कि वह प्रभावित लोगों के लिए गरिमामय जीवन का रास्ता तैयार कर सके, और इस मकसद से भू-अधिग्रहण से पहले परियोजनाओं के सामाजिक प्रभाव के आकलन का स्पष्ट प्रावधान था। परन्तु मोदी सरकार द्वारा लाये गए नए भू-अधिग्रहण अध्यादेश में कॉर्पोरेट के निहित स्वार्थ में इन सारे प्रावधानों को तिलांजलि दे दी गयी है और इसके साथ ही साथ वनाधिकार कानून 2006, वन संरक्षण कानून आदि जैसे 13 अन्य कानूनों को भी अध्यादेश के अन्तर्गत लाया गया है, जिसके वजह से लोगों के अधिकारों को निहित करने वाले जनपक्षीय कानून निष्प्रभावी हो जायेंगें, और सरकार तथा कंपनियों द्वारा व्यक्तिगत और सार्वजनिक ज़मीनों के अधिग्रहण/अतिक्रमण की प्रत्येक कार्यवाही कानूनी प्रक्रिया के दायरे से मुक्त हो जायेगी। सरकार बनने के पहले देश की जनता को तमाम गुलाबी सपने दिखाये गये थे। दावा किया गया था कि महँगाई और बेरोज़गारी की मार को ख़त्म किया जायेगा; पेट्रोल-डीज़ल से लेकर रसोई गैस की कीमतें घटेंगी, रेलवे भाड़ा नहीं बढ़ाया जायेगा; भ्रष्टाचार दूर होगा और विदेशों से इतना काला धन वापस लाया जायेगा कि हर आदमी के बैंक में लाखों रुपये पहुँच जायेंगे। लेकिन पिछले सात महीनों में ही देश की आम मेहनतकश जनता को समझ आने लगा है कि किसके “अच्छे दिन” आये हैं! रसोई गैस की कीमतें और और रेल किराया सत्ता में आते ही बढ़ चुका था , खाने-पीने की चीज़ों के दाम आसमान छू रहे हैं। श्रम क़ानूनों से मज़दूरों को मिलने वाली सुरक्षा को छीना जा चुका है, तमाम पब्लिक सेक्टर की मुनाफ़ा कमाने वाली कम्पनियों का निजीकरण किया जा रहा है, जिसका अंजाम होगा बड़े पैमाने पर सरकारी कर्मचारियों की छँटनी। ठेका प्रथा को ‘अप्रेण्टिस’ जैसे नये नामों से बढ़ावा दिया जा रहा है। पेट्रोलियम उत्पादों की अन्तरराष्ट्रीय कीमतें आधी हो जाने के बावजूद मोदी सरकार ने तमाम टैक्स और शुल्क बढ़ाकर उसकी कीमतों को ज़्यादा नीचे नहीं आने दिया है। विदेशों से काला धन वापस लाने को लेकर तरह-तरह के बहाने बनाये जा रहे हैं और देश में काले धन को और बढ़ावा देने के इन्तज़ाम किये जा रहे हैं। रुपये की कीमत में रिकार्ड गिरावट के चलते महँगाई और ज़्यादा बढ़ रही है। दूसरी तरफ़, अम्बानी, अदानी, बिड़ला, टाटा जैसे अपने आकाओं को मोदी सरकार एक के बाद एक तोहफ़े दे रही है! तमाम करों से छूट, लगभग मुफ्त बिजली, पानी, ज़मीन, ब्याजरहित कर्ज़ और मज़दूरों को मनमाफिक ढंग से लूटने की छूट दी जा रही है। देश की प्राकृतिक सम्पदा और जनता के पैसे से खड़े किये सार्वजनिक उद्योगों को औने-पौने दामों पर उन्हें सौंपा जा रहा है। ‘स्वदेशी’,  ‘देशभक्ति’, ‘राष्ट्रवाद’ का ढोल बजाते हुए सत्ता में आये मोदी ने अपनी सरकार बनने के साथ ही बीमा, रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों समेत तमाम क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को इजाज़त दे दी है। ‘मेक इन इण्डिया’ के सारे शोर-शराबे का अर्थ यही है कि “आओ दुनिया भर के मालिको, पूँजीपतियो और व्यापारियो! हमारे देश के सस्ते श्रम और प्राकृतिक संसाधनों को बेरोक-टोक जमकर लूटो!” मगर मोदी की तमाम धावा-धूपी और देशी-विदेशी लुटेरों के आगे पलक-पाँवड़े बिछाने की कोशिशों के बावजूद असलियत यह है कि निवेशक पूँजी लेकर आ ही नहीं रहे हैं।  लगातार गहराती मन्दी के कारण  विश्व पूँजीवादी व्यवस्था के सारे सरगना ख़ुद ही परेशान हैं। अति-उत्पादन के संकट के कारण दुनियाभर में उत्पादक गतिविधियाँ पहले ही धीमी पड़ रही हैं और तमाम उपायों के बावजूद बाज़ार में माँग उठ ही नहीं रही है, तो ‘मेक इन इंडिया’ करने के लिए पूँजी निवेशकों की लाइन कहाँ से लगने लगेगी? जो आयेगा भी, वह चाहेगा कि कम से कम लगाकर ज़्यादा से ज़्यादा निचोड़ ले जाये। मोदी आजकल यही लुकमा फेंकने की कोशिश कर रहे हैं कि किसी भी तरह आप पूँजी लगाओ तो सही, हम आपको यहाँ लूटमार मचाने की हर सुविधा की गारंटी करेंगे। हाल में भारतीय पूँजीपतियों के संगठन एसोचैम ने कहा कि निजी क्षेत्र में निवेश बढ़ने की सम्भावना ही कहाँ है जबकि बहुत से उद्योगों में पहले ही सिर्फ 30-40 प्रतिशत उत्पादन हो रहा है। अब तमाम पूँजीपति सरकार से खर्च बढ़ाने की गुहार लगा रहे हैं।
ज़ाहिर है कि अमीरों के “अच्छे दिनों” का ख़र्चा आम जनता की जेब से ही वसूला जायेगा। लेकिन आम लोग “अच्छे दिनों” की असलियत को समझ रहे हैं और उनके भीतर नाराज़गी और गुस्सा बढ़ रहा है। यही कारण है कि मोदी सरकार लुटेरों की सेवा करने के अपने जनविरोधी कदमों के साथ ही देश भर में साम्प्रदायिक तनाव भड़काया जा रहा है। पहले ‘लव जिहाद’ का शोर मचाया गया था, जो कि फ़र्जी निकला; उसके बाद, ‘घर वापसी’ के नाम पर तनाव पैदा किया जा रहा है ‘रामज़ादे-हरामज़ादे’ जैसी बयानबाज़ियाँ की जा रही हैं मोदी सरकार को भगवा ब्रिगेड 800 वर्षों बाद ‘हिन्दू राज’ की वापसी क़रार दे रही है कुछ वर्षों में सारे भारत को हिन्दू बनाने का एलान किया जा रहा है हिन्दू औरतों से चार बच्चे पैदा करने के लिए कहा जा रहा है! भगवा ब्रिगेड की हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिकता के साथ ओवैसी जैसी इस्लामिक कट्टरपंथी नेता भी साम्प्रदायिक उन्माद भड़का रहे हैं। साम्प्रदायिक माहौल और दंगों का लाभ चुनावों में हिन्दुत्ववादी कट्टरपंथियों को भी मिलेगा और साथ ही ओवैसी जैसे इस्लामिक कट्टरपंथियों को भी; इसके अलावा, कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम, सपा, बसपा, आप, राजद, जद (यू) जैसी तथाकथित सेक्युलर पार्टियों को भी वोटों के ध्रुवीकरण का लाभ मिलेगा। और इस तनाव के माहौल में किन लोगों की जान-माल का नुकसान होगा? आम मेहनतकश जनता का, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान!
ऐसे में यही उम्मीद की जानी चाहिये कि जनता‘अच्छे दिनों’ के भरम से बाहर निकले  और आने वाले कठिन दिनों के संघर्षों के लिए ख़ुद को तैयार करें।

 

No comments :

Post a Comment